राज्य में भी वशंवाद से अछूती नहीं है सियासत – राजनीतिक दल अपनी पीड़ी को स्थापित करने में नहीं छोड़ रहे हैं कसर

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हल्द्वानी।(डिम्पल पांडेय)वंशवाद नया नहीं है। यहां अविभाजित यूपी से लेकर ही फल-फूल रहा है। यहां के तमाम दिग्गज सियासतदां अपनी अगली पीढ़ी को सियासत में स्थापित करने को हाथ-पांव मार रहे हैं। हालाकि इनमें से कुछ नेता अपने विरासत को संभालने के लिए खूंटी गाढ़ने में सफल हो चुके हैं वहीं कुछ नेता इस कवायद में जुटे हूए हैं। अविभाजित यूपी से लेकर ही तमाम नेताओं ने अपनी अगली पीढ़ी के लिए जमीनी तैयार की जो आज तक जारी है। इधर देश की आजादी के बाद से ही यहां पर जिन नेताओं ने अपनी विरासत को आंगे हस्तांरित किया उनमें सर्वप्रथम गोविन्द बल्लभ पंत का नाम सर्वोपरि है। हालाकि पंत नेे अपने दामाद को भी सियासत में स्थापित करने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। उनके दामाद सीडी पांडे नैनीताल संसदीय सीट से 1952 व 1957 में सांसद बने।

                                   

गोविन्द बल्लभ पंत-सीडी पांडे-केसी पंत-इला पंत

हेमवती नन्दन बहुगुणा-विजय बहुगुणा-रीता बहुगुणा जोशी-सौरभ बहुगुणा

इन्दुमति शाह-मानवेन्द्र शाह-मनुजेन्द्र शाह-माला राज लक्ष्मी शाह

ब्रहमदत्त-नवप्रभात

गुलाब सिंह-प्रीतम सिंह

नारायण दत्त तिवारी-मनीष तिवारी

भुवन चन्द्र खंडूरी-मनीष खंडूरी-ऋतु खंडूरी-

यशपाल आर्या-संजीव आर्या

हरीश रावत-रेणुका रावत, आन्नद रावत, अनुपमा रावत

डा. इन्दिरा हदयेश-सुमित हदयेश

विपिन त्रिपाठी-पुष्पेष त्रिपाठी

प्रकाश पंत-चन्द्रा पंत

मुन्ना सिंह चैहान-मधु चैहान

सतपाल महाराज-अमृता रावत

बर्फियालाल जुंवाठा-राजेश जुंवाठा

राम सिंह कैड़ा-कमलेश कैड़ा

नैतिकता को ताक कर बदल दे रहे हैं पार्टी

हल्द्वानी। राजनीति व नैतिकता अब गुजरे जमाने की बातें हो गयी हैं। अब नेता अपने व्यक्तिगत फायदे के लिए और अपने परिवार को राजनीति में स्थापित करने के लिए मौका मिलते ही पार्टी भी बदल दे रहे हैं। हालाकि पहले यह बीमारी भारत के अन्य राज्यों में देखने को आती थी लेकिन अब उत्तराखंड भी इससे अछूता नहीं है। यहां सियासतदां अपने व अपने पीढ़ी के भविष्य को खतरे में देखते हुए दूसरी पार्टी में जाने से परहेज नहीं कर रहे हैं।

अपने जेहन में भी झांको नेताजी

हल्द्वानी। कांग्रेस व गांधी खानदान पर आरोप लगाने वाले लोगों को भी अपने जेहन में भी झांकना चाहिए। आज भले ही नेताजी कांग्रेस पर आये दिन आरोप लगाते रहते हैं लेकिन अपने पर दोष नहीं देते हैं। ऐसे कितने लोग हैं जो वंशवाद में कांग्रेस से भी आगे निकल गये हैं लेकिन उन्हीं पर अंगुली उठाना जायज नहीं है।

पंचायतो मे भी जमकर परिवारवाद

हल्द्वानी। पंचायतों मे भी परिवार जमकर फल-फूल रहा है। देखने में आ रहा है कि एक ही परिवार के लेाग सालों से प्रधान पद पर काबिज होते चले आ रहे हैं। आलम यह है कि पहले पति, फिर लड़का, फिर पत्नी, फिर लड़की और अब बहू। तो ये क्या परिवारवाद नहीं है। सपने में भी गांधी खानदान को कोसने वालों को इनसे सबक लेने की आवश्यक्ता है।

 

(डिम्पल पांडेय)

 

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