वीरान होने को है चन्द्रपुर, सिंयासतदां मौन -पलायन का जीता-जागता उदाहरण, आधा दर्जन लोग ही बसे गांव में

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हल्द्वानी। (धीरज भट्ट) पहाड़ों के गांवों का अस्तित्व किस तरह समाप्त होने को है इसकी एक मिसाल यहां अल्मोड़ा जिले के सोमेश्वर विधानसभा के अन्तर्गत पडो़लिया ग्राम सभा के तोक चन्द्रपुर में देखने को मिल जाती है। आजादी के 65 सालों बाद गांव में विद्युत बल्ब टिमटिमाया लेकिन तब तक गांव की 90 प्रतिशत आबादी पलायित हो चुकी थी। हालाकि यहां रोड आने के लिए सर्वे भी हो चुका है लेकिन रोड कब आयेगी यह तेा नहीं कहा जा सकता है। रोड जाने की आशा में गांव के कुछ लोगों ने विगत पांच सालों से यहां पर आना शुरू किया है।

ज्ञात हो कि चन्द्रपुर ग्राम सभा पड़ोलिया के तोक चन्द्रपुर में आता है और बिडंबना यह रही है कि यहां पर कुछ ही सालेां पूर्व लाइट पहंुची है। हालाकि पड़ोलिया में तो बिजली आये लंबा समय बीत चुका है लेकिन चन्द्रपुर के साथ क्यों सौतेला व्यवहार किया गया यह समझ से परे है। इधर गांव में आज से लगभग बीस साल पूर्व ही प्राइमरी स्कूल बंद होने से यहां के बच्चों को स्कूल जाने में समस्या आने लगी। इस कारण भी यहां से पलायन का ग्राफ और बढ़ा। आज भी अगर गांव में कोई बीमार हो जाये तो निकटतम सम्पर्क मार्ग यहां से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर है। यहां पर वैसे भी लोग कम होने के कारण समस्या और भी गंभीर हो जाती है।

इधर इस बीच कुछ जागरूक ग्रामीणों ने महानगरों से गांव का रूख किया तो उन्होंने अपने घरों की मरम्मत करनी शुरू की। लेकिन अभी भी अधिकतर घर जीर्ण-शीर्ण होने के कगार पर हैं या जीर्ण-शीर्ण हो चुके हैं। वहीं गंाव में चारों तरफ झाड़िया उग जाने से भी जंगली जानवरों का डर बना रहता है। वैसे भी दिन के समय अक्सर सुअर दिखना आम बात है।

तमसूणिया में बना चीड़ का जंगल

हल्द्वानी। कभी यहां पर फसल होती थी और अस्सी और नब्बे के दशक मेें यहां पर गांव के युवक क्रिकेट खेला करते थे। आज ग्रामीणों की लापरवाही से यहां पर चीड़ का घना जंगल बन चुका है। हालाकि 1986 में रिटायर होने के बाद भूतपूर्व सैनिक एनके भट्ट ने यहां अपने खेतों से चीड़ के पेड़ काटे थे। बाद में किसी ने इसकी सुध नहीं ली। कुछ साल पहले यहां पर पेड़ काटने की मुहिम चलायी थी लेकिन वह फिर धीमी पड़ गयी। आज आलम यह है कि यहां अकेले में आदमी जाने से डरता है।

दड़मधार में रहता है अकेले एक परिवार

हल्द्वानी। चन्द्रपुर के दड़मधार में एक परिवार अपने छोटे बच्चों को लेकर अकेले रहता है। उपर से वह नब्बे प्रतिशत दिव्यांग है। चारों तरफ से जंगल होने के कारण वहां पर दिन मेें ही रहना मुश्किल हो जाता है। एक तरफ बेरोजगारी और दूसरी तरफ विकलांगता। इस स्थिति मंे आदमी गांव से पलायन क्यों नहीं करेगा। उपर से घर के आस-पास घनी झाड़ियां उग आने के कारण यहंा पर जंगली जानवरों का डर लगा रहता है। उसने अनेक बार यहां की झाड़ी कटाने के लिए जनप्रतिनिधियों से गुहार लगायी है लेकिन अभी तक किसी ने नहीं सुनी। हालाकि लोग तमाम दावे करते हैं लेकिन वह धरातल पर नहीं दिखायी देते हैं।

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