किसानो के दर्द की दास्ताँ है, दाखिल ख़ारिज…

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हल्द्वानी – दुन्या भर में भारत की पहचान किसानों के देश के रूप में होती है, जमीन का मुद्दा यहां हमेशा ही बेहद संवेदनशील रहा है लेकिन यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण रहा है कि भूमिसुधार कानूनों के आने के बाद भी खेतीहर मजदूरों का एक बड़ा वर्ग जमीन के कब्जे पर अपना दखल साबित नहीं कर पाया है। शहरीकरण और रियल एस्टेट के विकास ने जमीनों पर बड़ी बिल्डिंग और  सड़को व हाइवों के निर्माण का एक ऐसा लालच पैदा किया है जिसकी वजह से हर क्षेत्र में भू-माफियाओं का नया तंत्र अपनी जड़े जमा चुका है जो भ्रष्ट अधिकारियों की सहायता से कमजोर और निर्बल किसानों की उपजाउ जमीन को खरीद लेना चाहते है या उस पर अपना कब्जा साबित कर देना चाहते है।इसी गंभीर विषय पर अपनी शाॅर्ट फिल्म दाखिल खारिज के साथ निर्माता डिम्पल पाण्डेय और निर्देशक मुकुल शर्मा ने इस मुद्दे को संवेदनशीलता के साथ दर्शाने की कोशिश की है। फिल्म के लेखक और निर्देशक मुकुल बताते है कि ये फिल्म कुल 7 मिनट की है और उत्तर प्रदेश में जमीन के टाइटलशिप के लिए प्रचलित प्रशासनिक शब्दावली दाखिल-खारिज को ध्यान में रखकर इस फिल्म का शीर्षक दिया गया है। जमीन के दाखिल-खारिज की प्रक्रिया इतनी जटिल और प्रशासनिक भ्रष्टाचार से भरी हुई है कि भारत में सबसे ज्यादा मुकदमें जमीन के है। देश के हर गांव, हर शहर में ऐसे मुकदमें है जिसमें कमजोर के लिए जीतने की उम्मीद बहुत कम है। काशवी फ़िल्म्ज़ एण्ड प्रोडक्शन के बैनर तले बनी यह शॉर्ट फ़िल्म जल्द ही देश भर में दर्शकों को देखने को मिलेगी। फिल्म में  मुख्य भूमिका में विमल कृष्ण उपाध्याय, राजेश कुमार शर्मा, योगेश शुक्ला, पीयूष परांजपे, कशिश पाण्डेय, प्रसून द्विवेदी, अभय तिवारी आदि ने अभिनय किया है ।

 

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